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Showing posts from January, 2017

एक एहसास 2

सुलझी हुई थी जुल्फ़े, मैं चाह कर भी न उलझ पाया, तुम वो कविता हो मेरी, जिसे मैं खुद न समझ पाया।

उम्मीद

रोज़ सूरज निकलता है अपनी रोशनी और नयी उम्मीदों के साथ, मैं भी निकलूँगा कल एक नयी रोशनी और उम्मीद के साथ।